इश्क़ में एक और मौत

चित्र
सारांश इश्क़ का परिणाम किसी के लिए सुखद होता हैं तो किसी के लिए दुःखद होता तो कोई सिर्फ राधा की तरह इश्क़ करता हैं... इस कहानी की शुरुआत एक यंग लडके सें होती हैं जो जवानी के दौर में अपने सपने साकार करने मुंबई की फ़िल्म इंडस्ट्री में जाता हैं काफ़ी स्ट्रेगल के बाद उसे फ़िल्म इंडस्ट्री की नामचीन हीरोइन के प्रोडक्शन हॉउस में असोसिएट डाइरेक्टर की नौकरी मिल जाती हैं और फिर इश्क़ की कहानी की शुरुआत होती हैं इस कहानी में कैसे होता हैं इश्क़ का इज़हार और क्यों होती हैं तकरार... अंत में लडके को हीरोइन की चिता क्यों जलानी पड़ती हैं कैसे इश्क़ की मौत होती हैं इन्ही सब बातों को जानने के लिए पढ़िए शब्द.In पर इश्क़ में एक और मौत...! में.. 🅰️🅰️🅰️🅰️🅰️🅰️🅰️🅰️🅰️🅰️ # इश्क़ में एक और मौत मैने मेकअप रूम के दरवाजे को नॉक किया था, कि तभी अंदर से लीना मेम की आवाज़ आई.... कौन हैं....? मेम मैं सुमित.... आपको सीन समझाने आया हूं मेम.... ! ओह सुमित अंदर आ जाओ डोर खुला हैं... जी मेम.... इतना कहते ही मै दरवाजे को धकेलता हुआ अंदर दाखिल हो गया था... रूम तक पहुंचने के लिए एक 5×3 की गैलरी थी जिसके आगे चल

अतीत का अखंड भारत (भाग-1)

मेरे मन की विचलता कही भी ठौर नहीं पा रही थी क्योंकि अक्सर सोशल मिडिया पर धर्म को लेकर अपशब्दों को देख मन कुंठित सा हो चला था इतना ही नहीं जब सोशल मिडिया के आलावा मैंने टीवी पर धर्म को लेकर  नुमाश नुमा डिवेट शो में होने वाले झगड़ों को देखा और सुना तो मन में सवाल उठा कि  आखिर हमारे ही देश में धर्म को लेकर इतना बवाल क्यू...? आखिर हम अपनी आने वाली पढ़ी को क्या देना और क्या दिखाना चाह रहें हैं...? हमारे हिन्दू धर्म के लोग भारत में रह रहें अन्य धर्मों के लोगों के खान पान रहन सहन और संस्कृति में शामिल होने में किसी भी तरह की शंका नहीं रखने के वबजूद भी हमें क्यों दोषी माना जाता हैं... मैंने अधिकतर यह भी देखा जब अन्य धर्म के लोग हमारे त्यौहारो में शामिल हुए तो  मिडिया ने और नेताओ ने सोहाद्र के नाम पर खूब पब्लिसिटी बटोरी और फिर इसके बाद सब वहीं के वहीं... मेरा ऐसे लोगों से ये पूछना हैं कि इस तरह के दिखावे का औचित्य क्या हैं जब मन में ही क्रूरता द्वेष की भावना भरी हो... मैं पूछना चाहता हूं ऐसे अवसर वादी और वहरूपियों से क्या वे हर साल ऐसे ही हिन्दुओं के हर त्यौहार मनाते हैं... इसका सीधा सा ज़वाब तो नहीं में ही हैं जबकि आज भी मैं अपने धर्म के लोगों को देखता हूं वो जब भी मस्जिद, दरगाह, चर्च और गुरुदवार या किसी भी धर्म के आस्था भवन के सामने से गुजरते हैं तो उनका सिर सम्मान और आस्था से झुकता ही देखा हैं मैंने... जबकि मुस्लिम धर्म के लोग ऐसा करते नहीं देखें गए हैं कइयों बार तो इन लोगों को मंदिरो के सामने थूकते हुए तक देखा हैं क्या उनका धर्म यही शिक्षा देता हैं....? कि अपने धर्म के लिए किसी के भी धर्म के अपमान के लिए इस हद तक गिर जाओ.... आखिर धर्म के प्रति ऐसी सोच और ये लड़ाई कब तक...?

आज ये बात कहना इसलिए ज़रूरी हैं कि सही में हमें अपने धर्म के प्रति सचेत होना ही पड़ेगा क्योंकि धर्म की किताबों को घर के मंदिर या घर के बुक सेल्फ में रख भर लेने से हम धर्म के पालक या अनुयायी नहीं हो जाते हैं धर्म के नियम और कर्म को आत्मसात करना होता हैं... आज की हिन्दू जनरेशन के बच्चे कितना रामायण, गीता या ग्रंथों  के बारे में जानते हैं..जबकि  मदरसों में  बचपन से ही धर्म की नीव और नियमों का पालन सिखाया जाता हैं तो फिर हिन्दुओं के गुरुकुलों पर इतना विरोधाभास क्यों...? शायद ये हमारा भारत देश धर्म के नाम पर नहीं अब सिर्फ बोटो की राजनीती पर चलता हैं... यहां सत्ता की बागडोर सम्हालने वाले सिर्फ और सिर्फ अपने वंश के लिए अपना धर्म और ईमान बेच रहें हैं और हिन्दुओं को जाती के नाम पर द्वेष पैदा करा कर देश को खोखला कर रहें हैं... यदि ऐसा ही रहा तो वो दिन दूर नहीं जब हमारा देश या तो इंडिया के नाम से जाना जाएगा या हिन्दोस्तान के नाम से जाना जाएगा... और भारत का नामोनिशान गुम हो जाएगा...इसीलिए इस वक़्त जरूरत हैं भारत के इतिहास को जानने की और हिन्दू धर्म को सही से समझने की ... तो आईये चलते हैं इतिहास के कुछ अहम पहलुओं को एकबार फिर से जान लेतें हैं और अपने हिंदुत्व को समझ लेतें हैं ....!

मैं अपने जीवन में हमेशा से ही दार्शनिक रहा हूं पता नहीं क्यों अपने धर्म और इतिहास को लेकर जिज्ञासा बनी रही इतिहास और धर्म के बारे में जानने की हमेशा उत्सुकता रही लेकिन कहते हैं ना यदि आप जिस भी चीज को शिद्दत और लगन से ढूंढ़ते हैं तो वो खुद वा खुद आपके पास आने का रास्ता बना लेती हैं... और यही बात मेरे साथ भी घटी... बात  स्कूल से कॉलेज में जाने की थी नौवीं क्लास में हमें उस दौर में विषय के हिसाब से दसवीं, ग्यारहवीं और बारहवीं करनी होती थी मतलब ये कि यदि नौवीं क्लास में अगर आपके अच्छे प्रजेन्टेज बने तो साइंस में दाखिला मिलता था और यदि 60% के लगभग बने तो कॉमर्स और उससे कम प्रजेन्टेज बने तो होमसाइंस और हिस्ट्री जैसे विषय लेने होते थे हालांकि मैं घर वालों की उम्मीद पर खरा ना उतर कर शायद किस्मत की उम्मीदों पर खरा उतरा था जिसने मेरी दिशा और दशा दिनों ही बदल दी... घर वाले चाहते थे कि मैं इंज़िनियर बनू पर ये हसरत उनकी पूरी करने में मैं सफल ना रह सका था... खैर जो होना था वो तो हो चुका था और जो हो रहा था उसका ज़िक्र में आपको सिलसिलेवार बतलाता जाऊंगा...हुआ यूं कि आज कॉलेज के शेसन का पहला दिन था वही हमारी मेरी ही तरह प्रोफ़ेसर जुगल के लिए भी आज इस कॉलेज में पहला दिन था... यूं तो जुगल सर को पढ़ाते पढ़ाते कई साल बीत चुके थे लेकिन उन्हे अपने विषय की मास्टरी के कारण अपने शहर को छोड़ दूसरे शहरों में उसे काफी  भटकना पडा था वजह यही रही कि बदलते ज़माने के साथ साथ उनकी हिस्ट्री और देश की हिस्ट्री भी पिछड़ती चली गयी ... नए ज़माने में स्टूडेंट डॉक्टर इंजिनियर या फिर अधिक से अधिक प्रोफ़ेसनल कोर्स की तरफ रूचि रखते चले गए यही कारण रहा शहरों में इंजिनियरिंग और डॉक्टरी कॉलेजो की भरमार सी हो गई शायद इसी आधुनिक शिक्षा के होड़ में इतिहास में रूचि रखने वाले स्टूडेंटो की तादाद कम होती चली गई...काफ़ी मशक्क़त और दाओ पेच के बाद जुगल सर को अपने गृह नगर की यूनिवर्सिटी में तवादला हुआ था ... खैर सुकून तो ये रहा कि कम से कम वो अपने शहर में तो आए वर्ना लोगों की ज़िन्दगीयां गुज़र जाती हैं दूसरे शहरों में... जो कभी भी एक शहर के होकर  रह नहीं पाते हैं...
जुगल सर के क्लास रूम में जाते ही हम मौजूदा स्टूडेंटों ने अपने नए प्रोफेसर का अभिनन्दन किया.. जुगल सर ने थोड़ा ठिठक कर हम लोगों की तरफ देखा और देखते हुए टेबिल के पास आकर अपनी किताबें टेबल पर रखते हुए बोले...

जुगल- और बाकी के स्टूडेंट कहा हैं...?

हम सब छुप ही रहें शायद इतनी बड़ी क्लास में हम 6 लोगों को देख कर उन्हें आश्चर्य हुआ होगा क्योंकि हम कुल टोटल चार लडके और दो लड़कियां भर ही थे 

जुगल-(गहरी सांस छोड़ते हुए बोला था )...ओके... बेठिये आप लोग...

और हम सब स्टूडेंट थेंक़्यू बोल कर बैठ जाते हैं

जुगल - आज पहला दिन हैं इसलिए शायद स्टूडेंट कम हैं..?

एक स्टूडेंट- नहीं सर हिस्ट्री के इस शेसन में हम इतने ही स्टूडेंट हैं.

जुगल- ऐसा क्यों...? ओह... सॉरी मैं खुद ही भूल गया था... लेकिन फिर भी ये प्रश्न तो उठता ही हैं आखिर ऐसा क्यों..?

स्टूडेंट- वो तो पता नहीं.. सर...!

दूसरा स्टूडेंट- क्या पता नहीं...60% से कम मर्क्स वालो को ही हिस्ट्री मत्थे पढ़ती हैं.. तू तो बोल ऐसे रहा हैं जैसे तू बोर्ड एगज़ाम में टॉप करके आया हैं .

इतना सुनकर सब हसने लगते हैं..

जुगल - सायलेंट... सायलेंट...सायलेंट... ओके चलो आप बैठ जाओ... तो चलिए सबसे पहले हम आपस में एक दूसरे का परिचय जान लेते हैं... सबसे पहले मैं अपना परिचय देदू... मैं प्रोफेसर जुगल अग्निहोत्री...

1. सर मैं महेंद्र वर्मा 
2. सर मैं रीतू गर्ग
3. सर मैं मनोज शाही
4. सर मैं पंकज सिंह
5. सर मैं जय शर्मा
6. और सर मैं अनुभा जैन

जुगल - ओके... वैसे मैं बतला दूं जिस तरह इस यूनिवर्सिटी में आप लोग नए हो ठीक उसी तरह मैं भी नया हूं... मतलब मैं पहले हरयाणा के कॉलेज में था वहा से ट्रांसफर होकर आया हूं मेरे लिए खास बात ये हैं कि आज से 20 साल पहले मैं भी उस बेंच पर वो वहां वाली बेच पर बैठ कर पढ़ा करता था इसी यूनिवर्सिटी से मैं भी पास आउट हूं...

सब स्टूडेंट एक दूसरे का चेहरा देखते हैं और हैरत करते हैं..

आप लोगों को विश्वास नहीं हो रहा होगा लेकिन यही सच हैं..हमारे समय में क्लास पूरी भरी रहती थी लेकिन आज इस क्लास को खाली देख कर मुझे बड़ा आश्चर्य हो रहा हैं... खैर छोड़ो... चलो आज हम नार्मल हिस्ट्री के बारे में बात करेंगे...चलिए आप लोग बताइये आप लोग हिस्ट्री के बारे में कितना जानते हैं..? मनोज आप बताओ..?

मनोज- (खड़ा हो जाता हैं) सर मैं ज्यादा तो कुछ नहीं जानता पर हा हमारे देश का इतिहास काफी रोचक रहा हैं...!

जुगल - किस तरह से रोचक रहा हैं... अपने शब्दों में वर्णन करों..

मनोज- सर यही कि हमारे देश का इतिहास कई हजार वर्ष पुराना माना जाता है... लगभग 65,000 साल पहले, पहले आधुनिक मनुष्य, या होमो सेपियन्स, अफ्रीका से भारतीय उपमहाद्वीप में पहुँचे थे, जहाँ वे पहले विकसित हुए थे। ... ये धीरे-धीरे सिंधु घाटी सभ्यता में विकसित हुए, दक्षिण एशिया में पहली शहरी संस्कृति, जो अब पाकिस्तान और पश्चिमी भारत में 2500-1900 ई. पू. में विकसित हुई थी

जुगल- गुड... ओके सिटडाउन... अच्छा रीता सबसे प्राचीनतम राजवंश कौन-सा है...?

रीतु (खडे होते हुए )— सर मौर्य वंश, मौर्य साम्राज्य की स्थापना सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य ने 322 ई. में की थी..

जुगल - बहुत अच्छे... अब आप बैठ जाओ अच्छा महेंद्र आप बताइए हमारे भारत के इतिहास को कितने भागों में बांटा गया हैं...?

मैं - (थोड़ा सोचते हुए ) सर हमारे भारत के भारतीय इतिहास को तीन भागों में बांटा गया हैं  पहला प्राचीन कल, दूसरा मध्यकाल और तीसरा हैं आधुनिक काल...!

जुगल - वेरीगुड...अच्छा पंकज क्या आपको पता हैं मुग़ल काल कब से कब तक रहा

पंकज- जी सर मुगल  शासन 17 वीं शताब्दी के आखिर में और 18 वीं शताब्दी की शुरुआत तक चला और 19 वीं शताब्दी के मध्य में समाप्त हुआ.

जुगल-बहुत खूब... थोड़ा विस्तार से बताए..?

पंकज -सर  बाबर ने 1526 ई से 1530 ई तक शासन किया. ... जो 1526 ई. में पानीपत के प्रथम युद्ध में दिल्ली सल्तनत के अंतिम वंश (लोदी वंश) के सुल्तान इब्राहीम लोदी की पराजय के साथ ही भारत में मुग़ल वंश की स्थापना हो गई थी...

जुगल- (ताली बजाते हुए ) मुझे नहीं लगता कि आप लोग हिस्ट्री में कमजोर हैं अच्छा जय आप बताओ कि मुगल कहां से आए थे..?

जय - मुगल फ़रग़ना वादी से आए एक तुर्की मुस्लिम तिमुरिड सिपहसालार बाबर ने मुग़ल राजवंश को स्थापित कियाथा उन्होंने उत्तरी भारत के कुछ हिस्सों पर हमला किया और दिल्ली के शासक इब्राहिम शाह लोधी को पानीपत के पहले युद्ध में हरा कर मुग़ल ने उत्तरी भारत के शासकों के रूप में दिल्ली के सुल्तान हो कर मुगल साम्राज्य की स्थापना की थी...

जुगल - बिलकुल और आप लोगों को पता हैं जिसके बाद करीब 18 वीं शताब्दी, देश के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम तक मुगलों ने भारतीय उपमहाद्धीप पर राज किया और ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के आने तक भारत में मुगलों ने अपना शासन चलाया था..आपको पता हैं मुगल सम्राज्य के लोग काफी कुशल, समृद्ध और संगठित थे... जबकि हमारे भारत के हिन्दू जलन और अवहेलना के चलते असंगठित हो गए थे और यही कारण रहा हमारे भारत के इतिहास में मुगल और अंग्रेजों ने भारत पर शासन किया...अच्छा अब अनुभा आप बताए मुगल काल का अंत कैसे हुआ..?

अनुभा- सर जो शासन मूल रूप से शासको ने किया वैसा शासन उनके उत्तराधिकारी नहीं कर सके यही सबसे बड़ा कारण मुगल काल के अंत होने का रहा..

जुगल- बिलकुल सही मुग़ल साम्राज्य एकतंत्र शासन-प्रणाली पर आधारित था. शासक के व्यक्तित्व और चरित्र के अनुसार साम्राज्य का विकास और ह्रास होता था. योग्य, अनुभवी और दूरदर्शी सम्राटों के युग में मुग़ल साम्राज्य का विकास अकबर से लेकर औरंगजेब तक हुआ था इन शासकों के प्रयत्न के फलस्वरूप मुग़ल साम्राज्य का विस्तार हुआ और साम्राज्य की सुरक्षा एवं प्रतिष्ठा पर कोई आँच नहीं आई. औरंगजेब की मृत्यु के बाद बहादुरशाह प्रथम से लेकर बहादुरशाह द्वितीय तक सभी मुग़ल शासक सिर्फ नाम मात्र के शासक रह गये थे. उनमें योग्यता, दृढ़ इच्छाशक्ति और दूरदर्शिता की कमी थी . बहादुरशाह प्रथम बुढ़ापे की अवस्था में गद्दी पर बैठा था. उसमें सफल शासक के सभी गुणों का अभाव था. वह अपने पुत्रों को अविश्वास की दृष्टि से देखता था. व्यावहारिक ज्ञान, कूटनीति और युद्ध-कला की शिक्षा देने के बदले मुग़ल शाहजादा शाही दरबार में रहकर राग-रंग में अधिक लिप्त रहते थे. यही कारण था कि औरंगजेब के बाद मुग़ल वंश में कोई योग्य शासक नहीं हुआ जो विघटनकारी तत्त्वों पर नियंत्रण रखकर मुग़ल साम्राज्य के पतन से बचा सके...मुगलों को यदि देखा जाए तो ये लुटेरे ही थे जिन्होंने दीन के नाम पर भारत को हर दृष्टि कोण से लूटा था...मुगल काल की इसी कड़ी के एक शासक का नाम आता था औरंगजेब का शासन मुगल शासकों में सबसे खराब शासन औरंगजेब का रहा... इतिहासकार कहते हैं कि औरंगजेब क्रूर शासक के साथ साथ कट्टर हिन्दू विरोधी भी था... औरंगजेब ने किस तरह हिंदुस्तान में हिंदुओं पर कहर ढाया था...अबुल मुज़फ्फर मुहिउद्दीन मुहम्मद औरंगजेब आलमगीर जो भारत का छठा मुगल शासक था...उसने अकबर के बाद सबसे ज्यादा लंबे समय तक भारत पर  सन- 1658 से सन - 1707 तक यानि पूरे 50 साल तक राज किया उसने अपने शासन काल में हिन्दुओं पर अत्याचार किये और कठोर नियम बनाए.. उसने अपने शासन करने का तरीका इस्लाम आधार पर लागू किया और हिंदुओं के धार्मिक स्थानों पर टैक्स लगा दिया..इसी के साथ उसने हिंदू रीति-रिवाज से मनाए जाने वाले त्योहारों पर प्रतिबंध लगा दिया था..
इतना ही नहीं उसने राजगद्दी हथियाने के लिए अपने पिता शाहजहां को तक कैद करा दिया था.. बड़े भाइयों की हत्या करा दी थी...उसने फिर से हिन्दुओं पर जजिया कर लगाया जो उसके समय में जजिया कर  सिर्फ हिन्दुओं को देना होता था...इतना ही नहीं उस काल में  स्त्रियों   की   स्थिति   काफी   दयनीय   थी..   उनको  पुरुषो की तरह  समान   अधिकार  नही   थे...  कुछ   उच्च   वर्ग   की   महिलाओं   की   दशा   ठीक   थी...   लेकिन   वह   महिलाएं   संख्या   में   बहुत   कम   थी   जबकि   निम्न   वर्ग   की   महिलाए   संख्या   में   बहुत   ज्यादा   थी   जिसके   साथ   अनेक   अत्याचार   किये   जाते   थे...  उस दौर में भारतीय समाज की महिलाओं को दो वर्गों में बांटा हुआ था 
जो  उच्च   वर्ग   से   संबंधित   स्त्रियों   का   समाज   में   सम्मान   था..   उनकी   उचित   शिक्षा   की   और   विशेष   ध्यान   दिया   जाता   था.. वहीं  मुगल   बादशाह   अपनी   बेगमों   का   पूरा  ध्यान   रखते   थे..   उन्हें   कुछ   विशेष   अधिकार   भी   दिए   गए   थे..   मुगलकाल   की   राजनीति   में ,  बाबर   की   मां ,  बहन ,  जहाँगीर   की   पत्नी ,  शाहजहां   की   पत्नी ,  औरंगजैब   की   बहन   आदि   ने   महत्वपूर्ण   भूमिका   निभाई...  उनके   पास   बड़ी - बड़ी   जागीरें   होती   थी..   उन्हें   विशेष   अनुदान   भी  मिलते थे... उन्हें   शिक्षा ,  व्यापार ,  चित्रकला ,  संगीत   कला ,  नृत्य   कला  में परगतता के लिए प्रोत्साहन   दिया जाता था...वहीं मध्यम और गरीब वर्ग की महिलाओं को वंछित रखा जाता था...

तभी कॉलेज टाइम ओवर होने का सायरन बज उठा था हम सब जुगल सर को ध्यान मग्न होकर सुन रहें थे वो जब इतिहास के बारे में बोल रहें थे तब वो दौर हमारी नज़रों में संज़ीदा हो उठा था मानो हम भी वहीं मौजूद हो...

जुगल- ओके स्टूडेंट... मुझे उम्मीद हैं आज का ये पहला दिन अच्छा लगा होगा और साथ ही मैं भी...

उनके इस प्रश्न से हम सब कुछ पल के लिए निरुत्तर से हो गए थे हम लोगों को समझ नहीं आ रहा था कि हम क्या कहें...

जुगल- अरे भई कहां खो गए आप लोग..?

रितु- थेंक्यू सर...!

फिर हम सभी ने बारी बारी से उनको धन्यवाद कहा
और वो मुस्कुराते हुए क्लास से बाहर चले गए... हम सब एक दूसरे को देखने लगें थे.

अनुभा- क्या कॉलेज में ऐसी ही प्रोफेसर होते हैं..?

रितु- हां... शायद...!

तभी मैंने कहा था

महेंद्र- कुछ कुछ होते हैं पर ऐसे प्रोफ़ेसर मैंने पहली बार देखा हैं...और तुम लोगों को..?

पंकज - यार जब वो बोल रहें थे तब मैं तो उसी दौर में चला गया था...

मनोज- यार हम सब की भी वहीं हालत थी... यार हिस्ट्री इज वैरी इंट्रेस्टिंग.. यार वो ज़माना भी क्या रहा होगा लेकिन एक बात तो हैं साला चाहे मुगल हो या अंग्रेज सालों ने हमें लूटा बहुत हैं..

तभी वाचमेन ने आ कर कहा

चलिए आपलोग क्लास रूम को लॉक करना हैं जो भी बात करनी हैं बाहर जा कर करों

और हम सब अपना अपना सामान उठा कर क्लास रूम के बाहर निकल आए थे...

वो दिन मेरे लिए बहुत ही महत्वपूर्ण रहा एक ऐसे शिक्षक को पाकर  मेरे अँधेरे मन के कोने में वो रौशनी दिखाई देने लगी थी जिसकी मुझे तलाश थी लेकिन तलाश के साथ साथ मन में काफ़ी सारे प्रश्न कौधने लगें थे उस रात मैं चैन से सो भी नहीं पाया था कुछ सवाल मेरे दिमाग में घर कर रहें थे जो मेरे धर्म की नीव के इतिहास से जुड़े हुए थे.. आखिर हमारे हिन्द के पूर्वजों का इतिहास क्या था... उन्होंने भारत को इतना महान कैसे बनाया क्या देव देवी इस पृथ्वी पर सही में थे... थे तो वो कैसे थे उस समय का हिन्दू कैसा था क्या हम उन्ही की संतान हैं... उन्होंने ग्रहो और नक्षत्रों की गड़ना कैसे की आदि आदि के प्रश्नों में मेरा मन उलझता रहा और सुबह कब हुई और कब मुझे नींद नेअपने आगोश घेर लिया मुझे पता ही नहीं चला था...शायद ये मेरे मन और सोच के प्रति नया परिवर्तन था जिसे हर सामान्य इंसान इसे समझने से कोसो दूर था... ये बात सही हैं समय के साथ साथ इंसान कितना बदलता गया क्या ये बदलाब बुरा था या सही ये तो मुझे पता नहीं था पर इतना ज़रूर पता था कि हम ज़माने के इस बदलाव में काफी कुछ पीछे छोड़ कर भूलते जा रहें हैं... मैं उसनीदा सा बिस्तर पर पड़ा पड़ा सोच रहा था तभी पिताजी की गुस्से भरी पुकार ने मेरी नींद को कोसों दूर भगा दिया था मैं फ़ौरन उठ कर अपनी स्टडी टेबल पर किताब खोल कर बैठ गया था.. पिता जी ने मेरे रूम में आते ही जब मुझे देखा तो उनका गुस्सा शायद शांत हो गया था..और मेरे प्रति उनका लेहज़ा भी बदल गया था 

पिता जी- 9 बजने बाले हैं आज क्या तुम्हे कॉलेज नहीं जाना हैं..?

मैं - जाना हैं पापा..

पापा- वो सायकिल का पैडल कैसे टूटा..?

मैं- पापा वो टूटा नहीं हैं उसकी कड़िया खराब हो गई हैं..

पापा- तो कल शाम को उसे तुम ठीक तो करा सकते थे.

मैं छुप था

पापा- अच्छा ठीक हैं अब जल्दी से उठो कॉलेज का टाइम हो रहा हैं आज मेरी सायकिल लेकर चले जाना नास्ता तैयार हैं आज मैं ऑफिस थोड़ा लेट जाऊंगा..

मैं- (उठते हुए) जी पापा..! और अपना बिस्तर ठीक करने को हुआ ही था
पापा - तुम जाओ तैयार हो जाओ बिस्तर मैं ठीक किये देता हूं...

और मैं चुपचाप अपने रूम से बाहर निकल आया था... और जल्द ही तैयार होकर कॉलेज के लिए जाने को हुआ तभी पापा ने मेरे शर्ट की कालर ठीक करते हुए कहा..

पापा- सम्हल के और एक तरफ से जाना... लंच रख दिया हैं पूरा फिनिश करना समझे..और कॉलेज खत्म होते ही सीधे घर आ जाना इधर उधर कही आवारा गर्दी में मत लग जाना..

मैं - जी पापा...! और मैं उनसे इज़ाजत लेकर कॉलेज की तरफ कूच कर गया था... पापा जी की ये बात आज की नहीं थी उनके ये शब्द मेरे लिए रोज के थे. उन्हें पता हैं कि मैं उनकी हर बात को मानता हूं लेकिन वो अपने इस फर्ज़ से कभी नहीं चूकते थे..
मैं अपनी धुन में सयकिल के पेडल मारे जा रहा रहा आज मुझे प्रोफेसर जी से कुछ सवालों को पूछना था मैं हर बार अपने दिमाग़ में सवालों को पूछने की भूमिका बनाए जा रहा था लेकिन प्रश्न ये था कि सबाल कौन सा पूछा जाए क्या वो मेरे सवालों का उत्तर देंगे..? क्या उनसे ये सवाल करना ठीक रहेगा..?
लेकिन जो भी हो पर एक बार पूछ लेने में क्या बुराई हैं..

क्रमशः-2







टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

कोट्स-ए-दास्तां

आधार की जंग (व्यंग)

OTT कैसे शुरू करें..? पार्ट -1