इश्क़ में एक और मौत

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सारांश इश्क़ का परिणाम किसी के लिए सुखद होता हैं तो किसी के लिए दुःखद होता तो कोई सिर्फ राधा की तरह इश्क़ करता हैं... इस कहानी की शुरुआत एक यंग लडके सें होती हैं जो जवानी के दौर में अपने सपने साकार करने मुंबई की फ़िल्म इंडस्ट्री में जाता हैं काफ़ी स्ट्रेगल के बाद उसे फ़िल्म इंडस्ट्री की नामचीन हीरोइन के प्रोडक्शन हॉउस में असोसिएट डाइरेक्टर की नौकरी मिल जाती हैं और फिर इश्क़ की कहानी की शुरुआत होती हैं इस कहानी में कैसे होता हैं इश्क़ का इज़हार और क्यों होती हैं तकरार... अंत में लडके को हीरोइन की चिता क्यों जलानी पड़ती हैं कैसे इश्क़ की मौत होती हैं इन्ही सब बातों को जानने के लिए पढ़िए शब्द.In पर इश्क़ में एक और मौत...! में.. 🅰️🅰️🅰️🅰️🅰️🅰️🅰️🅰️🅰️🅰️ # इश्क़ में एक और मौत मैने मेकअप रूम के दरवाजे को नॉक किया था, कि तभी अंदर से लीना मेम की आवाज़ आई.... कौन हैं....? मेम मैं सुमित.... आपको सीन समझाने आया हूं मेम.... ! ओह सुमित अंदर आ जाओ डोर खुला हैं... जी मेम.... इतना कहते ही मै दरवाजे को धकेलता हुआ अंदर दाखिल हो गया था... रूम तक पहुंचने के लिए एक 5×3 की गैलरी थी जिसके आगे चल

सन्डे के ट्रेफिक का मज़ा... एक लाइव रिपोर्ट


  संडे के ट्राफिक का मजा....एक लाईव रिपोर्ट

मैं जब गांव में था तो मेरा मन भी शहर की ओर को भागता था, मैं बचपन से शहर में बसने का सपना लिए जैसे तैसे सरकारी शिक्षा को गृहण करता रहा और कूंद फांद कर ग्रेजुएशन करने की खातिर आखिर सजोए हुए सपने के इस शहर में आकर बस ही गया. इस बात को लगभग पंद्रह साल होने को आ गए लेकिन टिकने का ठीकाना अब तक इस्थाई नहीं कर पाया..., या यूं समझले पिछले चौदह सालों से मैं शहर की तमाम कालोनियों में हर मोहल्ले में घाट-घाट का पानी पी कर आया हूं...काश सरकार भी ऐसे अनुभवी किरायेदरों के लिए कोई आवार्ड घोषित करती तों हमें उस एवार्ड के पुरुष्कार में अब तक घरोंदा मिल ही गया होता, यहां पर ना तों कोई माकन मालिक इतना मेहरवान होता है कि 11 महीने से ज्यादा टिकने दे और नाहीं सरकार की इतनी हिम्मत होती है कि चलों इन किराएदारों के हित में कुछ कर दें आखिर हमारी बिरादरी भी तों सरकार की बोट बैंक हैं. खैर छोडो मैं भी कहां सपनों के आशियाने के जख्मो कों कुरेदने में लग गया.

तो जनाब ये कॉलोनी इस शहर की व्यस्ततम कालोनियो में से  अतिव्यस्ततम कालोनी है ,जहाँ  मैं किराये के मकान में रहता रह रहा हूं पॉश क़लोनी के नाम पर यहां अब कुछ भी पॉश नही है भले यहां चौबास घंटे बिजलीपानी ना हो पर चौबीसों घंटे चलने वाली ये सड़क हमारे अपार्टमेंट के सामने से ही गुजरती है. इसकी व्यस्तता का मुख्य कारण ये भी है कि मोहल्ले के पीछे की मेंन सड़क जो रेल्वे स्टेशन की तरफ जाती है उस पर हमेसा ही जाम लगा रहता हैं उसे यहां के समझदार वाशिंदे कैश मेन रोड़ के नाम से बुलाते हैं. कारण उस पर ट्राफिक पुलिश की चेकिंग का कटोरा नुमा नाका मेहरवान पुलिस के द्वारा लगा दिया जाता है..जिसके कारण अधिकतर छोटे बडे दो पहिया चार पहिया बाहन का रूख इसी सड़क से गुजरने लगता है क्योकि ये सड़क भी रेल्वे स्टेसन को ओर जाती है इस सड़क पर कभी कोई चेकिंग नहीं होती जिसके कारण वगैर हेलमेट घारी, दो पहियों पर चार-चार सबारी आदि-आदि चालक इसी सड़क पर हाबी हो जानें से इस सड़क पर ट्राफिक का दवाव बना ही रहता हैं स्टेशन यहां से करीब होने के कारण यहां हर घर में दुकानें भी है यानि इस सड़क पर काफी अच्छा मार्केट है हालांकि कॉलोनी पूर्णत रूप से वैध होते हुए भी अवैध है.
भारतीय परंपरा के अनुसार सरकारी नियमों को तोड़ने का पालन हर प्रकार से यहां किया गया है. रहवासी क़लोनी को बिना अनुमति के कामर्शियल में तबदील करने की प्रथा का पालन कर अवैध निर्माण, पानी की चोरी, बिजली की चोरी और दुकानों के निर्माण से भरपूर अतिक्रमण की जीती जागती तस्वीर को एक सच्चे भारतीय नागरिक की तरह पेश किया है. जो हमारे देश के ऐसे तमाम शहरों में होना आम बात है.आज मैं बालकनी में बैठा अखबार पढ़ रहा था. क्योकि आज सन्डे जो था. मतलब पूरी आज़ादी लेकिन आप मेरी इस बात का कतई इस अर्थ में ना लें कि मेरी धरम पत्नी मायके गई हुई है जो हमें आज के दिन की आज़ादी है. जनाब ऐसा कुछ नही है हम तो शादी शुदा वेचुलर प्राणी है....! नहीं समझे ? अरे भाई , दरअसल हम सरकारी दामाद तों हैं नहीं बस जीवन यापन के लिए पत्रकारिता करते हैं जनाब वो भी ईमानदारी की जब हमारा विवाह हुआ था तब हमारी ससुराल बाले बहुत खुश थे की दामाद जी शहर में होनहार पत्रकार है. आज नहीं तों कल अपना घर तों वो बनावा ही लेंगे और आठ दस सालों में तो कोई ना कोई कारोबार भी जमा ही लेंगे इसी हौंसलें के चलते हमारी अग्नीसाक्षी पत्नी ने भी हमारा चार पांच साल तों खूब साथ दिया दौड़-दौड़ कर उसने खूब मकान शिफ्ट करवाये लेकिन हर ग्यारह माह में घर बदलने के फैर में उसका पिछले दो साल से हौसला हवा हो गया, वो जान गई थी के ऐसी पत्रकारिता के चलते तों इस जनम में घर बन गया.. और हम से ये कहके मायके में जा बैठी के अगर एक साल में घर नहीं बनवाया तों मैं उसे हमेशा हमेशा के लिए भूल जाऊ.. तों जनाब आप समझ ही गए होगे इस आने वाले एक साल में हम अपना घर कहां से बना पायेंगे इस शहर में कम से कम किराये से रह कर हम अपने बचपन के सपने को तों पूरा कर ही रहे हैं.. ऐसा नही है कि हमने मकान के लोन के लिए अपनी चप्पलें नहीं घिसी कमबख्त ऐसा कोई बैंक इस शहर का नहीं बचा जिसमें घर बनवाने की आर्जी ना दी हो बस बात पत्रकारिता के पेशे की सुन कर बैंक बालें ऐसे हो जाते हैं जैसे उन्हे कोई सांप सूंघ गया हो.. अब आप ही बताओ क्या पत्रकार होना गुनाह हैं...? इसी बात के चलते वो भी मुंह फुला के मायके में बैंठ कर हमें कोस रही हैं और इसीलिए आज का दिन हमारी आजादी का दिन है सोचा था नाश्ता–पानी करके टी.वी. देखूंगा लकिन आज ना जानें बिजली वालों को हमारे मुहल्ले वासियों से कौन सी दुश्मनी हो गयी जो आज सुबह से ही लाइट गुल करके बैठ गए. उस पर से ये जान लेवा गर्मी अब आप ही सोचे हम मासूम मुहल्ले वालों पर क्या गुजर रही होगी ये दर्द आप बिजली की कृपापात्र वाले लोग क्या जानों ऊपर से ये पवन देव  भी यहां से रुष्ट होकर ना जानें कहां की हुस्नों की जुल्फें उड़ा रहे है. और यहां लू के थपेडों से लोंगो के प्राण सुखा रहे हे. वैसे तों अभी ये उमस भरी गर्मी मेरे प्राण लेने पर तुली है, अक्सर ऐसा ही होता है जब भी लाइट गुल तों हवा भी गुल, ऐसा प्रतीत होता है के बिजली विभाग और पवन देव में कोई आपसी साठगांठ हो गई है लेकिन ये वो नही जानते के ऐसे समझोते लम्बे समय तक टिक नहीं पाते है..

तभी मेरे कानो मे जोर-जोर से गाड़ियों के होर्न की आवाजे गूंजने लगी थी . मैने बालकनी से झांककर देखा तों नीचे रोड़ पर भारी जाम लग था मैने ट्राफिक के जाम होने की स्तिथि को जानने की कोशिश की तों पता चला कि कोई पानी का भरा टेंकर बीच चौराहे से लगी सड़क के बीचो–बीच खड़ा करके पता नही कहां गायब हो गया. वहीं साइड में लगे सब्जियों के ठेलों और दुकानों के सामानों की प्रदर्शिनियों ने बीस फीट चौडी सड़क को चौदह फीट की सीमा की हद्द तक सीमित कर दिया था. यनि दोनों तरफ के दुकानदार सड़क पर तीन-तीन फिट पर कब्ज़ा जामए हुए थे. टैंकर और सब्जियों के ठेलों के बीच में लगभग दो फीट का रास्ता बचा था जिसमें पहले मैं पहले मैं की तर्ज़ पर आनें जानें की धमाचौकडी लगी हुई थी. बेचारे बड़े वाहन वाले जाम मे फंसे होने की खीज का प्रदर्सन सिर्फ हार्न बजा-बजा कर प्रकट कर पा रहे थे. उनका ट्राफिक के इस जाम में ध्वनि प्रदूषण में पूर्ण रूप से योगदान झलक रहा था उस पर ना तों ठेले बाले टस से मस हो रहे थे और नहीं दुकानदार अपना सामान पीछे हटाने को तैयार थे. बस खड़े होकर तमाशा देखा जा रहा था. मैंने अपनी नजरे दूसरी तरफ को घुमाई तो वहां  कम्बखत किसी टेंकर चालक को भी क्या सूझी जो बीच सड़क मे रोड़ा अटका के चला गया. पता नहीं कहां जा कर चेन की बासुरी बजा रहा होगा. मुझें भी ये नजारा देख कर खीज भी आ रही थी और मज़ा भी आ रहा था. क्योंकि इस ट्राफिक के जाम समाज के सभी वर्ग और समुदाय के लोगों की समझदारीयां जो देखने को मिल रही थी और साथ अजीबो गरीब कैरेक्टर भी देखने को मिल रहे थे बालकनी की उंचाई से नीचे देखने से ऐसा लग रहा था जैसे तवे पर कबाब सिक रहे हो जो लोग मेरी तरह 11 नंबर की सबारी करके जा रहें थे उन्हें इस ट्राफिक से कोई परेशानी नहीं थी वो कैसे ना कैसे जैसे तैसे निकलते चलें जा रहें थे. नहीं समझे भाई मैं पैदल चलने की बात कर रहा हूं कई सालों इस शहर में 11 नं. जिन्दावाद के नारे दौहराते हुए अपनी मंजिलें तय कर रहा हूं.

इस शहर को इस्मार्ट सिटी का दर्ज़ा दिलाने की कवायद नेता, मंत्री, अफसर और जनता लगातार मांग कर रही हैं,कई बार धरने और जूलूस पक्ष और विपक्ष के द्वारा जनता के सहयोग से होता आ रहा है. लेकिन क्या शहर की ऐसी व्यब्स्थाए इस्मार्ट सिटी का दर्ज़ा दिला पयेंगी मुझें तो नही लगता..तभी किसी ने ऑटो में से अपना सुंदर सा चेहरा निकाल कर पान की पीक उगली थी.

ओ भाई जरा देख कर थूकों....

अरे अंकल नीचे थूका है कौन सा तेरे उपर थूका है..?

ये देखों आपने मेरे जूते पर थूका है  

मैने तो जमीन पर थूका है बीच में तेरा जूता आ गया तो मैं क्या करू...चल ज्यादा होशियारी मत दिखा समझा

पापा रहने दोना क्यो इन के मुंह लग रहे हो (स्कूटर पर पीछे बैठी लड़की ने कहा)

क्या जमाना आ गया हैं...लोगों में जरा भी सभ्याता नही है..

ए...क्या बड़ बड़ कर रिया हैं तेरी सभ्यता की भव्यता का यहीं प्रदर्शन कर दूंगा समझा..

वो सभ्य अदमी अपना जरा सा मुंह लिए चुपचाप खड़ा रहा.

जिस शहर की ऐसी मनसिकता की जनता हो तो मैं नहीं मानता के ये शहर कभी स्मार्ट सिटी बन पाएगा जब तक शहर के वासी अपनी मानसिकता नहीं बदलेंगे शहर का रूप नहीं बदलेगा  मैं ये सोच ही रहा था की किसी बाइक के अजीब से  साउंड ने मेरा ध्यान उस और खीच था एक रोमियो टाइप लड़का गाड़ी का एक्सिलेटर दें दें कर वातावरण मे खीज पैदा कर रहा था. तभी कोई जागरूक दुकानदार टेंकर चालक को काहीं से पकड़ कर ले आया..आते हुए ड्रायवर के हाव भाव देख कर बिलकुल भी ऐसा नहीं लग रहा था की उसकी चाय की चुस्कियों के चक्कर में इतने लोग जाम में फंस कर परेशान हैं उसे ज़रा भी अफ़सोस नहीं था. मौलाना किसी फ़िल्मी हीरो की तरह इस्टाइल से ट्रेक्टर पर कूंद कर ड्राइविंग शीट पर बैठा था तभी ट्राफिक में फंसे लोगोने उसे देख राहत की सांस ली.. ट्रैक्टर पर बैठते ही मौलाना ने सबसे पहले कुर्ते की जेब से गुटखे का पाऊच निकला, पाऊच को फाड़ा और इत्मीनान से गुटखा खाया और गुटखे का खली रेपर को इस्टाइल से एक ओर हवा में उछाल दिया और मुस्कुराते हुए अपने उस खटारा ट्रैक्टर को स्टार्ट किया ट्रैक्टर स्टार्टहोते ही भकभकाते हुए ढेर सारा कला धुआं छोड़ कर गुडुप-गुडुप करके बंद हो गया. ट्राफिक मे फंसे लोंगो के चेहरे पर हवाइया उड़ने लगी, तभी भीड़ में से किसी ने खीजते हुए  कहा

 ---“मियां इसे बेंच कर बैलगाडी लें लेते तों ये मुसीबत ना होती”.

इतना सुनते ही मौलाना की तैयोरिया खिच गई थी. और लगे मौलाना सेल्फ पे सेल्फ मारने पर ट्रैक्टर तों मनों पत्थर का हो गया हो वो तों अड़ियल टट्टू की तरह थोडा हलचल करता और शांत हो जाता ये किरिया कलाप थोड़ी देर तक चलता रहा. ट्राफिक मे फंसे लोग धूप और गर्मी में तप रहे थे और अंदर ही अंदर बिल बिला रहें थे..उपर से ये मौलाना और उसका ट्रेक्टर लोंगो की जान लेने पर आमदा था अबतो लोंगो का धेर्य टूटने सा लगा थी कोई मौलाना पर फब्तियां कस रहा था तों कोई उन्हें अभद्र भाषा से सम्मानित करने लगे थे. मौलाना के चहरे की हवाइयां उड़ने लगी थी. उसे समझ मे नहीं आ रहा था क्या करें मौलाना की बुद्धि सेल्फ मारने पर ही अटक गई थी जिस के कारण ट्रैक्टर की बेट्री पूरी तरह से बैठ गई थी अब तों सेल्फ लगाने पर ट्रेक्टर मे कोई हचल नहीं हो रही थी मौलाना के पास अब अपना सिर पीटने के अलावा कुछ नहीं बचा था तभी ट्राफिक में फंसे किसी भले से आदमी में मददगार की भावना जाग्रत हुई तों वो मौलना के पास आया और मौलाना को टेक्निकल नालेज देंने लगा मौलाना उसकी बातों को ध्यान से सुन रहा था. और इस जाम में फंसा हर इंसान वेसब्री में खड़ा था ना कोई आगे बढ़ रहा था ना कोई पीछे को खसक रहा था सब के चेहरे के भाव यही थे कि जल्दी से इस ट्राफिक से निजात पाए..कोई भगवान को याद कर रहा था तो कोई अल्लाह से गुहार लगा रहा था  और मुझे ये माजरा देख कर हंसी आ रही थी कि गलतियां इंसान करता हे और भगवान,अल्लाह से सहायता मांगता है ऊपर वाला भी हमेशा सबक और सीख देता है आभास करा देता है सचेत करता है फिर भी मनुष्य उसके इशारों को नहीं समझता है जब नहीं समझता है तो फिर ऊपर वाला भी क्यों मदद करे सब प्रार्थनाएं बेकार साबित हो रही थी वही गर्मी के और ट्राफिक की नजाकत को देखते हुए सामने ही होटल वाला दो रुपए में एक गिलास पानी बेचनें लगा था..यही हमारे समाज मे बहुत से लोग ऐसे है जो लोंगो की मज़बूरी और हालातों का भरपूर लाभ लेने से नहीं चुकते “प्यासे को पानी पिलाने “ की कहावत यहां दम तोड़ चुकी थी होटल मालिक की इंसानियत और ज़मीर दोनों ही मार चुके थे. अब मैने अपनी गर्दन कैमरे की भांति ट्राफिक जाम के मुख्य पहलू पर घुमाई, मौलाना के ट्रेक्टर का बोनट पूर्ण रूप से खुला पडा था उसके सरे अस्थि पंजर ठीक वैसे ही दिखाई दे रहे थे जेसे किसी गरीब मरियल से मजदूर को जबरन काम पर जोता हो शायद ट्रेक्टर को भी अपने ऐसे प्रदर्सन से शर्म महसूस हो रही थी मौलाना बोनट के अंदर कही हाँथ डाल कर किसी पुर्जे को हिला रहा था. वही दो-चार मोहल्ले के फालतू ज्ञानी भी खड़े थे अपनी-अपनी राय देंने के साथ-साथ कर उस ट्रेक्टर के मॉडल का बखान भी करने में लगे थे लेकिन किसी भले ज्ञानी का ध्यान इस और नहीं जा रहा था की उन सब्जी वालों के ठेलों को हटाकर ट्राफिक को हल्का करने मे मदद करें कहते है ना कि मजमा लगानें की लोंगो को जो आदत है तभी सब्जियों के ठेलो की तरफ से ही तूं-तूं ,मैं-मं की आवाजें तेज होने लगी थी मेरा ध्यान उसी पर था किसी गाड़ी वाले का धक्का लगने के कारण ठेले वाला गाड़ी वालों पर चिल्ला रहा था. तभी अंदर की गली से चार-छह आवारा कुत्ते गुत्थमगुत्थी-लड़ते-भिड़ते आए और सब्जी वालों के ठेलों के निचे आ कर भिड़ने लगे जिससे वहां अफरा-तफरी  मच गई कुत्तों की भिड़त से एक फायदा ये हुआ कि संकरी गली चौड़ी हो गई और वाहनों का रेला तेजी से निकलने लगा तभी साइड में से एक कार बाले साहब को पता नहीं क्या सुझा कि उन्होंने जल्दी जाने के फेर में अपनी कार निकालने के फेर में फंसाली. वाह क्या बात है इंसान अपने स्वार्थ के कारण दूसरों के बारे में कभी नहीं सोचता अगर वो थोडा इंतजार कर लेतें तों ये नौबत ना आती अब कार ना तों आगे हो रही थी ना पीछे पहले तों जो धीरे धीरे निकल रहे थे अब तो वो भी नहीं निकल पा रहे थे. 21स्वी शदी में भी हम हिचकोले भरे शफर में फंसे हुए हैं इंसान के अंदर का 19स्वी शदी का मनुष्य भी कब का मर चुका है और ना ही 21स्वीं शदी में जी रहा हैं आज के युग मे इंसान ने इंसानियत ताक पर ही रख दी है और दूसरों से इंसानियत की उम्मीद करता है आज के इंसान में सहयोग कि भावना ने स्वार्थ का रूप जो लें लिया हैं. मुझें तो यही लग रहा था कि चलों उन वे-जुवानों ने इन इंसानों के हालातों को देख कर ही शायद ये गुत्थमगुत्थी की थी के आनें जानें का रास्ता तों खुलें लेकिन इंसान तों उनसे भी दूर की सोच का अज्ञानि निकला...! मनुष्य सिर्फ मनुष्य होनें भर का फ़ायदा उठा रहा हैं.

अब वहां मौलाना अपने हाथ में 5 लीटर की कुप्पी लेकर किसी से मिन्नतें कर रहा था. हूं अब समझ आया ट्रैक्टर का डीजल खत्म हो गया लेकिन ये समझ नही आया के वो लोगों से किस बात के लिए कह रहा है.. तभी किसी ने उसे अपना मोबाईल उसे दिया उसने जल्दी से किसी को  फोन लगाया..

 हां हलो शाकिर....भाई घर से पांच लीटर घासलेट (कैरोसिन) ला दें यार मैं यहां बड़ी मुसीबत में फंस गया हूं..  

क्या बात है आपको पता है शहर में ही ट्रैक्टर सबसे ज्यादा कैरोसिन से चलते है...और वहां गांव में हमने आज तक किसी भी ट्रेक्टर को केरोसीन से चलते नही देखा...इस तरह की चूना लगाऊ गतिविधियों को देख कर तो ऐसा ही लगता है के शहर का जिम्मेदार सरकारी तंत्र घृतराष्ट्र की तरह सिर्फ सुन भर रहा है.. तभी ट्रेक्टर चालक की फोन पर कर रहें बात की आवाज में तेजी और तैशगी आ गई थी नो जिससे भी बात कर रहा था उस पर चिल्ला रहा था..तभी दूसरी तरफ से 3 पुलिस वाले गुस्से मे आते दिखाई दिए उनमें से एक पुलिस वाला जोर-जोर से विसिल बजाए जा रहा था तीनों ने बीच चोराहे पर आकार इस्तिथि का जायजा लिया तब उनकी समझमें आया कि ट्राफिक रुकने का मुख्य कारण बीच रास्ते में खड़ा वो ट्रेक्टर है तभी एक पुलिस कर्मी ट्रेक्टर के पास आ कर ट्रैक्टर पर जोर से ड़डा मारते हुए चिल्ला कर पूछने लगा

 –“अरे.ऽ.ऽ.ऽये ! साला खटारा ट्रेक्टर किसका है...?”.

पुलिश वाले को चिल्लाता देख मौलाना की हालत खराब हो गयी. तभी भीड़ में खडे किसी जागरूक इंसान ने मौलाना की तरफ इशारा करके पुलिस वाले को बता देता है पुलिश वाला मौलाना को देख कर उस पर गुर्राता है और हवा में डंडा लहराता हुआ उसकी तरफ लपकता हुआ बोलता है

“अब खड़ा होकर तमासा क्या देख रहा है तूं...?”.

पुलिस वाले को देख कर भी मौलाना पर कोई असर नहीं होता है

अरे शब्बन भाई...तुम्हारा ट्रेक्टर है..

हां साहब पानी की सप्लाई देनी थी ड्रायवर की तबियत खराब हो गयी तो मैं ही लें आया..मुझे पता नही था के इस में डीजल कम है अब लड़के से केरोसिन बुलवाया है आता ही होगा..

तभी वो पुलिस वाला आपने दोनों साथीयों से कहता है

इसे तो यहां से हटने में टाईम लगेगा वो उधर जो कार फंसी है तुम लोग उसे वहां से निकाल कर छोटे वाहन निकलावाओं..तबतक शब्बन भाई ने पुलिस वालों के लिए ठंडा बुलवा लिया था..और पुलिस वाले ठंडे की ठंडक भरी घूट से अपने गले को तर करते हुए उस फंसी हुई कार को निकालने में जुट गये और ट्राफिक की सारी विवस्था को अपने कंट्रोल मे लें लिया और जो लोग अभी तक लम्पटई कर रहे थे वे अब पुलिस के सामने पूर्णरूप से अपनी सभ्यता और मानवता का परिचय देने लगे थे. इधर मौका पाते ही मौलाना शब्बन भाई पता नहीं कब गायब हो गया था वो अब भीड़ं में कहीं भी दिखाई नहीं दें रहा था..उसके ना दिखने से मुझे ऐसा लगा शायद वो खुद ही केरोसिन लेने चला गया होगा. इन 10-15 मिनिटों में अब स्तिथी सामान्य होने लगी थी. मेरा भी अब वक्त किसी प्राइम टाइम के सीरियल मे होने वाले ब्रेक की तरह लेने का हो गया था. सोचा शयद अब तों लाइट आ ही गई होगी. और मैं बालकनी से हट कर सीधा अपने रूम मे आ कर देखा तों ऐसा नहीं था सीलिंग फेन छत्त पर लटके आराम की मुद्रा में था. तभी कमरे की लाइट एक छड़ के लिए चमकी थी और फेन भी हल्का सा घूम कर थम्म सा गया था मुझे ऐसा लगा दोनों अपने जीवित होने का सबूत मुझे दें रहे हो, मेरा रूम ओवन के माफिक भभक रहा था सो मैंने बाहर बैठना ही उच्चित समझा और मैने टेबल पर रखी पानी से भारी बोतल को लेकर मैं फिर से बालकनी में आकर बैठ गया आज के दिन के गर्मी से निजात पाने और टाइम पास के लिए इससे अच्छी जगह कोई और नहीं लग रही थी गला सुख रहा था बोतल का पानी भी गरम था फिर भी बमुश्किल एक घुट पानी अपने हलक से नीचे उतरा और मेरी नज़रे फिर से ट्रैक्टर की तरफ जा कर टिक गई अब थोडा ट्राफिक कम हो चुका था. पुलिश ने कुछ लोगो की मदद से ट्रेक्टर को पानी के टेंकर से अलग कर लिया था लगभग 100 फीट ट्रैक्टर के आगे पीछे तक का ट्राफिक भी हट गया था. मौलाना और पुलिस वाले होटल के बाहर खड़े खाने पीने में व्यस्त थे..ट्रैक्टर में दो लोग जुटे हुए थे..एक डीजल भर रहा था तो दूसरा ट्रैक्टर के कलपुर्जे कस रहा था.. सड़क पर सभ्यता और सालीनता दौड़ रही थी अब किसी को कोई तकलीफ नही थी और ना ट्राफिक जाम हो रहा था..तभी तेज हाफनी भरता हुआ ट्रेक्टर शोर मचाने लगा था और काले धुएं का भपका आसमान में छोड़ कर फिर चुप हो गया था..तभी शब्बन मियां चिल्लाए

अरे कमबख्तों बेटरी बैठ गयी है उसकी सेल्फ से स्टार्ट नहीं होगा..दो-चार लोगों से धक्का लगवाओं

शब्बन भाई का मशविरा सुनकर उन लड़कों ने दो तीन लोगों से गुजारिश करने लगे के ट्रैक्टर में धक्का लगवा दें... यहां शब्बन भाई ने पुलिस वाले की जेब में कुछ रूपये रख दिए तो तुरंत पुलिस वाले ने अपनी जेब से पैसे निकाल कर देखा और कहा.. 

अरे शब्बन भाई इतने से क्या होगा टीआई सहाब तक बात पहुंची थी उन्ही ने तो हम लोगो को यहा भेजा है..भगवान कसम अपकी जगह कोई और होता तो...

तो क्या दरोगा जी टीआई सहाब से कह देना कि मैं उन से बाद में आकर मिल लूंगा तुम्हे क्या पता नही है कि हर हफ्ते के हफ्ते सारी गाड़ीयों का हफ्ता पहुंचाता हूं..अभी दो हजार ही रख लो हमारा और आपका ये कोई पहला लेन-देन तो है नही आगे पीछे ऐज्स्ट कर लेंगे..आओ थोड़ा ट्रैक्टर में धक्का लगवा दो

क्या भाईजान आप भी ना अब हम से धक्का भी लगवाओगे..चलो भाई आ जाओ थोड़ा हाथ लगवा लों

और ये लोग ट्रैक्टर के पास पहुंचते है तब तक वहां चार पांच लोग भी तैयार हो जाते है..उनमें से शब्बन भाई का एक लड़का ट्रेक्टर का जल्दी से स्टेरिंग संभालता है और  ये सब ट्रैक्टर में धक्का लगाते है लेकिन टेंकर फरा होने के कारण ट्रैक्टर टस से मस नही होता..

क्यो सलीम इसका टेंकर अलग नहीं होगा क्या..?

नही भाईजान जबतक ट्रैक्टर स्टार्ट नही होगा ये टेंकर की चाबी नहीं खुलेगी ये ठिया हाड्रोलिक से ही उठेगा तभी ये चाबी निकलेगी भाईजान..

अरे कोई नही भाईजान एक बार और जोर लगा के देख लेते है और फिर सब फिर से धक्का लगाने में जुट जाते है...काफी मेहनत और मशक्त के बाद भी ट्रैक्टर स्टार्ट नही होता है.. चिलचिलाती धूप में सबकी जान निकल जाती है सब हाफने से लगते है..तभी एक पुलिस वाला शब्बन भाई से कहता है

भाईजान आपतो इसे टोचन करवा के ले जाओ ऐसे में तो किसी ना किसी का दम निकल जाएगा

हां भाईजान दरोगा जी सही कह रहें है अभी दो बजे एक ट्रेक्टर खाली हो कर आएगा तो उसी से टोचन करवा लेंगे

तो शब्बन भाई हम लोग चलें जितना जल दी हो इसे हटवा लेना..

हां हां भई आप लोग जाओ मैं हटवा लूंगा

और सब वहां से चले जाते है धूप में खड़ा बूढा से ट्रेक्टर मानों अपने आप में ही शर्मशार हो रहा हो उसे देख कर मुझें उसे देख कर ऐसा ही लग रहा था.. तभी घात लगाए पानी के प्यासे क़लोनी वासी अपने अपने पानी के बरतन लें कर आ जाते है और देखते ही देखते टैंकर को खाली कर देते है. जय हो भारतीय नागरिको का

हमारे इस शहर को, ओ...! ना.. ना.., मेरा तों गाव ही भला है कम से कम वहा के लोगो की तो ऐसी मानसिकता तो नही  है और शहर की तरह वहां लोंगो को ऐसा रेंगना तों नहीं पड़ता मैं तों इस शहर में किराये दार जो हूं, मैं इसे अपना कैसे कहूं. जब शहर के ही लोग इस शहर को खोखला करने मे लगे हैं मैं तो यहां इस शहर का वासी नहीं हो सकता जहां के मंत्री पार्षद नेता और जनता ऐसी हो तो उस शहर का विकास कैसे संभव हो सकता हैं.. ऐसे तो बन गया ये स्मार्ट सीटी आज का ये साक्षात नजारा देख कर और पिछले चौदह साल के कर्म क्षेत्र में रहकर सह कर्मियों के व्यौहार को देखकर तो आज मेरा मन इस शहर से उचट सा गया है सही में यहां के लोग इंसान का शोषण ज्यादा करते है इंसान को कहीं का नहीं रहने देते हैं अब मैंने भी तय कर लिया हैं कि अब मुझे भी अपने गाव लौट जाना चाहिए जब भी ये शहर स्मार्ट बन जायेगा तब मैं अपने बच्चों को ज़रूर यह घुमाने लेकर आऊंगा और इसी निर्णय के साथ मैं हमेशा के लिए इस शहर से पलायन का सोच कर उठ खड़ा हुआ था....

समाप्त....!

DB-🅰️rymoulik 

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